आलिम ने किया मेरी चुदास का इलाज-2

हॉट गांड हिंदी सेक्स कहानी में पढ़ें कि कैसे मेरा जिन्न उतारने वाले आलिम ने मुझे दुल्हन बनाकर मेरी गांड का उद्घाटन किया. उनके बड़े लंड से मेरा गांड फट गयी थी.

दोस्तो,
मेरी कहानी के पिछले भाग
मुझे आलिम साहब से मुहब्बत हो गयी
में अपने पढ़ा कि आलिम ने मुझे दुल्हन की तरह सजवाया. बेडरूम को भी सुहागरात के कमरे की तरह सजवाया. मैं बहुत खुश थी कि उन्होंने मेरे लिए इतना कुछ किया. मुझे ख्याल भी नहीं था कि वे आज क्या मनसूबे लेकर मुझे चोदने वाले हैं.

अब आगे Hot Gand Hindi Sex Kahani:

आलिम साहब मेरे मम्मों को निचोड़ते रहे और निप्पल चूसते रहे.
मुझे दर्द भी होता था और मजा भी आता था.

अब जलालुद्दीन साहब ने मेरी कमर को चाटना शुरू किया और नीचे आते हुए मेरे पैरों तक आ गए.

उन्होंने मेरे पैर का एक अंगूठा अपने मुंह में लिया और चूसने लगे. उन्होंने एक एक करके मेरे पैर की सारी उँगलियाँ चूस डालीं और मेरे तलवों को किसी कुत्ते की तरह चाटते हुए ऊपर की तरफ आने लगे.

मेरी जांघों को चाटते हुए वो मेरी चूत तक आकर रुक गए. मेरी काले रंग की सेक्सी अंडरवियर गीली हो चुकी थी.

जलालुद्दीन साहब ने मेरी अंडरवियर को चाटना शुरू कर दिया.
कुछ देर तक मेरी चड्डी को चाटने के बाद उन्होंने मेरी चड्डी दोनों हाथों से खींची और फाड़ कर मेरे जिस्म से अलग कर दी.

मेरी चूत भी बहुत गीली थी जो अपना रस टपका रही थी.

जलालुद्दीन साहब ने मेरी बिना बालों वाली चमकती चूत देखी तो उनको मानो नशा छा गया और उन्होंने मेरी चूत को बेहताशा चाटना शुरू कर दिया.

जब उन्होंने एकदम बढ़िया तरीके से मेरी चूत को चाट कर उसकी सफाई कर दी तो मुझे अपनी अंडरवियर उतारने का इशारा किया.
यह देख कर मैंने भी उनकी अंडरवियर खींच कर नीचे कर दी और उनको नंगा कर दिया.

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आज तो उनका लण्ड सांप नहीं बल्कि पूरा अजगर बना हुआ था.
मैंने हैरान होकर पूछा- मेरे सरताज, ये क्या हुआ?
जलालुद्दीन मुस्कुराते हुए बोले- दो गोलियां खाई हैं, आज तुमको दर्द देना है ना!

मैं शरमा गई और नजरें नीचे झुका लीं.
लेकिन नीचे तो मेरे दिल के मालिक का बड़ा सा फनफनाता हुआ लण्ड था. उनके लण्ड के आगे बहुत गीला हो गया था.

मैंने हाथ से उनका लण्ड पकड़ा और चमड़ी पीछे कर के सुपारा बाहर कर दिया तो उनके लण्ड से रस की बूँदें नीचे टपकने लगीं.
मैं घुटनों पर बैठ गई और उनके लण्ड से टपकते रस को पीने लगी.

जलालुद्दीन साहब सिसकारियां लेते हुए मेरे सर को दबाने लगे और कोशिश करने लगे कि उनका लण्ड मेरे पेट तक घुस जाए.
मेरे लण्ड चूसने से उसका आकार और भी बढ़ रहा था.

थोड़ी देर में जलालुद्दीन साहब बिस्तर पर लेट गए और मुझसे अपने ऊपर आने को बोले.
मैं उनकी छाती पर बैठ गई तो वो बोले- छाती पर नहीं बल्कि लण्ड पर बैठना है.
तो मैं उनके लण्ड के पास आकर बैठ गई.

उन्होंने मुझे दोनों हाथों से ऊपर किया और अपने तने हुए लण्ड पर बैठा दिया.

मैं जलालुद्दीन साहब से बीस पचीस बार चुदवा चुकी थी फिर भी आज उनका लण्ड काफी बड़ा, मोटा और कड़क लग रहा था.
जब उनका लण्ड मेरी चूत में घुसा तो मुझे ऐसा लगा मानो मेरे अंदर गर्म गर्म लोहे का डंडा घुस गया है.

खैर, मजा तो मुझे बहुत आ रहा था.

अब मैं उनके लण्ड के ऊपर बैठ कर उछलने लगी. मैं ऊपर उठती तो सररर से उनका लण्ड बाहर निकल आता और फिर बैठ जाती तो एक बार फिर धचाक से उनका लण्ड मेरे अंदर समा जाता.

आज लण्ड रोज से ज्यादा मोटा और लम्बा लग रहा था.
जब मैं लण्ड पर उछलती थी तो ऐसा लगता था मानो आज मेरी चूत नहीं बल्कि मेरी बच्चेदानी चुद जाएगी.

मेरे उछलने पर मेरे मम्मे भी उछलते थे, मैं पूरा ऊपर उठ कर धप्प से लण्ड पर बैठ जाती थी तो जलालुद्दीन साहब को भी बहुत मजा आता था.

काफी देर तक मैं जलालुद्दीन साहब के लण्ड पर उछलती रही तो जलालुद्दीन साहब ने अब पोजीशन बदलने को कहा.

मैं बिस्तर के एक कोने में घोड़ी बन गई और जलालुद्दीन साहब मेरे पीछे आ गए, पीछे आकर उन्होंने अपना लण्ड पीछे से ही मेरी चूत में पेल दिया.
उन्होंने इतनी जोर से लण्ड पेला कि मेरी आह निकल गई.

अब जलालुद्दीन साहब अपना पूरा लण्ड बाहर निकालते और एक जोरदार धक्का मारकर अपना पूरा का पूरा मूसल मेरी चूत में पेल देते.

उनके हर धक्के के साथ मेरा सारा बदन हिल जाता और मेरे मम्मे तो इतना तेज हिलते मानो निकल कर गिर ही जाएंगे.

काफी देर तक जलालुद्दीन साहब मुझे पीछे से चोदते रहे, मुझे हल्का हल्का दर्द तो हो रहा था लेकिन पहली चुदाई वाले दर्द के आगे तो ये कुछ भी नहीं था.

अब जलालुद्दीन साहब ने अपना लण्ड एक बार फिर बाहर निकाला तो फिर अंदर नहीं डाला.

मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो जलालुद्दीन साहब पास में रखी तेल की शीशी उठा रहे थे.
उनका लण्ड तो मेरी चूत के पानी से पहले ही चिकना हो चुका था लेकिन फिर भी उन्होंने अपने लण्ड पर ढेर सारा तेल उंडेल लिया.

फिर उन्होंने मेरी गांड पर तेल मालिश शुरू कर दी और एक उंगली गांड के अंदर घुसाकर तेल अंदर पहुंचाने लगे.

कुछ देर एक उंगली से गांड की दीवारें चिकनी करने के बाद उन्होंने दो उँगलियाँ मेरी गांड में डाल दीं और धीरे धीरे जगह बनाते बनाते दोनों उँगलियाँ मेरी गांड में पूरी अंदर घुसा डालीं.
अब जलालुद्दीन बोले- मैं तुम्हारी गांड में लण्ड घुसाऊँगा, शोर मत मचाना.

मैंने आज तक बस मुंह और चूत ही चुदवाए थे इसलिए गांड में लण्ड घुसने की बात सुनकर ही मेरी गांड फट गई.
मुझे लगा कि उस दिन तो बस पाद निकली थी लेकिन कहीं आज टट्टी ही ना निकल जाए.
बड़ी मुश्किल से मैंने खुद को संभाले रखा.

अब जलालुद्दीन साहब ने मेरी गांड पर अपना लण्ड रखा और घिसने लगे.
कुछ देर तक घिसने के बाद उन्होंने धीरे धीरे जोर लगाया और लण्ड मेरी गांड के अंदर दबाने लगे.

लेकिन गांड के छोटे से छेद में ये भयानक लण्ड घुसने को तैयार ही नहीं था.

अब जलालुद्दीन ने पीछे से एक हाथ मेरे मुंह पर रखा और एक हाथ मेरी कमर में डाला.

फिर उन्होंने पूरी ताकत से एक धक्का दिया तो मेरी गांड में उनका लण्ड आधा घुस गया.
मुझे इतना भयानक दर्द हुआ जो कि पहली चुदाई पर भी नहीं हुआ था. मेरी जोर से चीख निकल गई लेकिन किसी ने सुनी नहीं क्यूंकि जलालुद्दीन साहब ने पहले ही मेरा मुंह दबा दिया था.

अब जलालुद्दीन धीरे धीरे मेरी गांड में अपना लण्ड गोल गोल घुमाने लगे.
मुझे बहुत भयानक दर्द हो रहा था लेकिन मैं चिल्ला भी नहीं पा रही थी.

कुछ देर में जलालुद्दीन साहब ने एक जोरदार धक्का और लगाया और इसी के साथ उनका पूरा लण्ड मेरे शरीर में घुस गया.

मेरे आंसू निकल रहे थे, मैं दर्द के मारे चीखना चाहती थी और किसी भी तरह उनके लण्ड को मेरी गांड से बाहर निकालना चाहती थी लेकिन मैं कुछ कर नहीं पा रही थी.

अब जलालुद्दीन ने बड़ी ही बेरहमी से मेरी गांड मारना शुरू कर दी.
वो पूरी ताकत से धक्के मारते थे और मेरे बदन के सारे पुर्जे हिला डालते थे.

मैंने अपनी टांगों कि तरफ देखा तो सन्न रह गई.

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आलिम साहब ने मेरी गांड पूरी तरह से फाड़ डाली थी और मेरी गांड से खून बहते हुए बिस्तर पर इकट्ठा हो रहा था.

जलालुद्दीन साहब ने पीछे से मेरे बाल पकड़ लिए और बोले- यही दर्द चाहिए था न तुझको छिनाल, आज तेरी गांड का वो हाल करूँगा कि अगले पांच महीनों तक हगना भूल जाएगी.

मैं दर्द के मारे मरी जा रही थी लेकिन जलालुद्दीन साहब रुकने का नाम नहीं ले रहे थे.

जलालुद्दीन साहब काफी देर तक मुझे पीछे से पेलते रहे और गोली के कारण उनका सामान अभी तक पहले जैसा ही तना हुआ था.

मैंने कहा- आज तो आपका लण्ड किसी मूसल जैसा लग रहा है
जलालुद्दीन साहब धक्के मारते हुए बोले- ये सब तो अंग्रेजी दवाओं का कमाल है, इसी कारण तो आज तेरी गांड के चीथड़े हो रहे हैं.

जब लगभग दस मिनट तक जलालुद्दीन साहब ने मेरी गांड चुदाई कर डाली तो मुझे दर्द कुछ कम सा लगने लगा था.
अब मेरी गांड फ़ैल चुकी थी और उनका लण्ड काफी आराम से अंदर बाहर हो पा रहा था.

मेरी बुरी तरह फट चुकी गांड अभी भी दुःख रही थी लेकिन गांड के अंदर बाहर हो रहे लण्ड का अहसास इस दर्द को काफी हद तक कम कर रहा था.

अब मुझे दर्द के साथ मजा भी आ रहा था और मैं भी अपनी गांड हिला हिला कर जलालुद्दीन साहब का साथ दे रही थी.

मैंने कहा- मेरे सरताज, और जोर से चोदिये अपनी रखैल को.
जलालुद्दीन साहब बोले- हाँ जान, आज की चुदाई तुम सारी जिंदगी नहीं भूलोगी.

यह कहकर उन्होंने अपनी स्पीड और भी बढ़ा दी.

जलालुद्दीन साहब अपने मूसल जैसे लण्ड को मेरी गांड में पेलते पेलते थक चुके थे और बुरी तरह पसीना पसीना हो चुके थे.
उनके चेहरे से बहता हुआ गर्म गर्म पसीना मेरी पीठ पर टपकता था तो मेरा मन करता था कि इस मेहनत के पसीने को चाट लूँ.

काफी देर तक मेरी गांड की ठुकाई होने के बाद मेरी गांड में बुरी तरह जलन होने लगी थी तो मैंने जलालुद्दीन साहब से मिन्नतें की कि अब लण्ड गांड से निकाल कर चाहें तो मेरे मुंह या चूत में घुसा दें.

मैंने कहा- सरताज, आज आपका लण्ड पानी क्यों नहीं छोड़ रहा है? एक घंटा तो हो गया चोदते चोदते.
जलालुद्दीन साहब बोले- जानेमन, आज तो तुम भी पानी नहीं छोड़ रही हो.

मैंने कहा- सब आपका ही किया धरा है, एक मासूम लड़की को चोद चोद कर चुड़क्कड़ रांड बना दिया. जब तक आप अपना पानी नहीं निकालोगे तब तक मैं अपना पानी भी नहीं निकलने दूंगी.
जलालुद्दीन साहब बोले- अभी तो पार्टी शुरू हुई है, अभी से थोड़े ही पानी निकलेगा.

मैं बोली- जान, पानी जब निकालना हो तब निकालना लेकिन गांड में मत निकालना. आपका पानी पिए बिना मेरी चूत की प्यास नहीं बुझती.
जलालुद्दीन साहब बोले- हाँ रंडी, पहले ठीक से गांड तो मार लेने दे, फिर तेरी चूत मारूंगा.

अब जलालुद्दीन साहब भी पीछे से मेरी गांड ठोकते ठोकते थक चुके थे तो उन्होंने अपना लण्ड बाहर निकाल लिया.

घोड़ी बने बने मेरे घुटने भी छिल गए थे तो मैं भी बिस्तर पर सीधे लेट गई.
सच में आज तो जलालुद्दीन ने मेरे पसीने छुड़वा दिए थे.

बहत देर से लगातार चुदाई चल रही थी फिर भी ना ही तो मेरा और ना ही जलालुद्दीन का पानी छूटा था.

अब मैं बिस्तर पर लेटी थी तो जलालुद्दीन साहब मेरे ऊपर चढ़ गए और मेरी चूत में अपना लण्ड घुसा कर एक बार फिर धक्के मारने लगे.

लेकिन पिछले लम्बे समय से जो लड़की किसी सड़कछाप रंडी की तरह भकाभक गांड मरवा रही थी उसे चूत में लण्ड डालने से भला क्या फर्क पड़ता, तो मैं चुपचाप लेटी रही और जलालुद्दीन साहब अपना लण्ड मेरी चूत में पेलते रहे.

लगभग आधे घंटे तक उन्होंने मेरी चूत चोदी तो मेरा पानी छूटने की घडी आई.
अचानक ही मेरे बदन में ऊँची ऊँची लहरें उठने लगीं, मेरा बदन अकड़ने लगा.

मैंने जलालुद्दीन साहब की पीठ पर अपने नाख़ून गड़ा दिए और बोली- मेरा पानी छूट रहा है. और तेज तेज धक्के मारिये.

जलालुद्दीन साहब यह सुन कर और तेजी से भका भक धक्के मारने लगे और मेरा सारा बदन हिलने लगा.

तभी मुझे हजार वाल्ट का झटका लगा और मेरा बदन झटके खाने लगा.
इसी के साथ फचाक फचाक करके मेरी चूत ने अपना पानी छोड़ दिया.
मेरी चूत और गांड मेरे चूतरस में भीग गए.

जलालुद्दीन साहब ने मुझे चोदना बंद किया और मेरी चूत के पास आकर मेरी चूत का पानी पीने लगे.
उन्होंने चाट चाट कर मेरी चूत और जाँघों तक फैला मेरा पानी पी डाला.

अब जलालुद्दीन की बारी थी पानी छोड़ने की.
उन्होंने मुझे अपने सामने घुटनों पर बैठने को कहा.
मैं उनके आगे बैठ गई तो उन्होंने अपना लण्ड मेरे मुंह में घुसाया और मेरा मुंह चोदने लगे.

वो तब तक मेरा मुंह चोदते रहे जब तक कि मेरे जबड़े नहीं हिलने लग गए और मेरी आँखों से आंसू नहीं आ गए.

थक कर मैंने उनको रुकने को कहा और अपने हाथ से उनका लण्ड पकड़ कर खुद ही चूसने लगी.

कुछ देर तक उनका लण्ड चूसते चूसते मुझे अचानक अपने मुंह में उनके लण्ड का आकार बड़ा लगने लगा.

जलालुद्दीन बोले- मेरा पानी निकलने वाला है जान, चूत में लोगी या मुंह में?
मैंने कहा- अभी तो मुंह में ही लेना चाहती हूँ. भर दीजिये अपना पानी अपनी रखैल के मुंह में.

जलालुद्दीन बोले- हाँ मेरी जान, आज तो इतना पानी निकालूंगा कि तेरे पेट में जगह कम पड़ जाएगी.
अब जलालुद्दीन ने मेरे बाल पकडे और एक बार फिर तेजी से मेरा मुंह चोदने लगे.

अचानक उनकी टांगों में थिरकन होने लगी, उनका बदन अकड़ने लगा और उनका लण्ड गर्म हो गया.

जलालुद्दीन के लण्ड ने सात आठ झटके बहुत तेज तेज मेरे मुंह के अंदर मारे और अपनी पिचकारियां छोड़ दीं.

जैसे ही पहली एक दो पिचकारियां निकलीं तो मेरा मुंह इतना ज्यादा भर गया कि वीर्य बाहर निकलने लगा.
मेरे सरताज का कीमती वीर्य बर्बाद ना हो जाए इसलिए मैंने तुरंत ही सारा वीर्य निगल लिया.

लेकिन इससे पहले कि मैं अपने मुंह में भरा सारा वीर्य ख़त्म कर पाती, जलालुद्दीन के लण्ड ने और पांच छह पिचकारियां मार दीं.

इस बार वीर्य इतना अधिक था कि ना चाहते हुए भी बहुत सारा वीर्य मेरे मुंह से बाहर आने लगा.
मैंने घबराकर पास ही पड़ी एक प्याली उठाई और उसमें सारा वीर्य उंडेल दिया.

लेकिन इस चक्कर में जलालुद्दीन साहब का लण्ड मेरे मुंह से बाहर आ गया था.

इसके बाद जलालुद्दीन साहब के लण्ड ने फिर से दो तीन पिचकारियां मारीं लेकिन मेरे मुंह से बाहर होने के कारण वो पिचकारियां सीधे मेरे मुंह पर पड़ीं और मेरे बाल, आँखें, गाल, नाक सब वीर्य से नहा गए.
कुछ वीर्य बहते हुए मेरे मम्मों पर भी गिर गया.

मैंने तुरंत जलालुद्दीन साहब का लण्ड अपने मुंह में डाल लिया ताकि बचा खुचा वीर्य बर्बाद ना हो और मैं तब तक लण्ड को जोर जोर से चूसती रही जब तक कि लण्ड पूरा खाली नहीं हो गया.

अब जलालुद्दीन साहब ने अपना लण्ड मेरे मुंह से बाहर निकाल लिया और थक कर बिस्तर पर लेट गए.

मैंने अपने चेहरे और बदन पर फैले उनके वीर्य को प्याली में इकट्ठा किया और सारा का सारा वीर्य गटगट करके पी लिया.

सच में मर्दों का वीर्य बहुत जायकेदार होता है. जो औरतें इसको पीने में नखरे करती हैं वो नालायक होती हैं.

जब हवस का तूफ़ान थमा तो मैंने देखा कि मेरी गांड मार मार कर जलालुद्दीन साहब ने उसका रंगरूप ही उजाड़ दिया था.
मेरी गांड बुरी तरह फटी हुई थी और उसमें से ढेर सारा खून निकल कर बिस्तर पर फैला हुआ था.

जब मैं हवस की आग में जल रही थी तो फटी गांड का दर्द महसूस नहीं हो रहा था लेकिन अब तो दर्द के मारे मुझसे उठा ही नहीं जा रहा था.

दर्द के मारे मैं जलालुद्दीन साहब से लिपट गई.
जलालुद्दीन साहब बोले- क्या पहली बार जैसा दर्द हो रहा है?

मैंने कहा- हाँ, हॉट गांड की वैसी ही दर्दनाक चुदाई कर डाली है आपने. पहली बार का दर्द याद दिला दिया.

अब जलालुद्दीन साहब हँसते हुए बोले- इसका मतलब मैं शर्त जीत गया, तुमने कहा था कि पहली बार वाला दर्द दिया तो एक महीने तक मुझे याद नहीं करोगी.
मेरी आँखों से आंसू निकल आये.

मैं खुद भी नहीं बता सकती थी कि ये आंसू आज की भयानक गांड चुदाई के कारण निकले हैं या अपनी मुहब्बत से दूर जाने के गम में निकले हैं.

अपनी गांड के दर्द को नजरअंदाज करती हुई मैं उठी और रोती हुई कमरे के एक कोने में जाकर बैठ गई.
सारी रात मैं रोते रोते अपने आंसू अपने ही हाथों से पौंछती रही और सामने मेरे खून से भीगे बिस्तर पर जलालुद्दीन आराम से नंगे ही सोते रहे.

रोते रोते मेरी कब आँख लग गई पता ही नहीं चला.

सुबह एक हिजड़े ने आकर मुझे उठाया तो मैंने देखा कि जलालुद्दीन कमरे में नहीं हैं.
एक बार फिर मेरी आँखों से आंसू बह निकले.

हिजड़े ने मेरी हालत देखी तो उसको भी दया आ गई.
उसने मेरे आंसू पौंछे, मुझे उठाकर बिस्तर पर बैठाया और मेरी सफाई करने लगी.

मेरे बदन पर अभी भी मेरी मुहब्बत की निशानी फैली हुई थी.
हिजड़े ने गर्म पानी से मेरा बदन साफ़ किया, मेरी जांघों पर जम गया खून साफ़ किया और मेरी फटी हुई गांड पर दवाई लगाई.

उसने मेरा बिस्तर साफ़ करके हमारे कल रात के मसले हुए फूल एक कोने में फैंक दिए फिर साफ़ सुथरे सलवार कमीज पहना कर मुझे लेटा दिया.

अगले तीन चार दिन में मेरे घाव काफी भर गए लेकिन फिर भी चलने में पैर दुखते थे और हगने पर तो मानो अंदर तक जलन होने लगती थी.

इन तीन चार दिनों में जलालुद्दीन साहब मेरे पास एक बार भी नहीं आये.
मैंने भी इसको अपनी किस्मत मानकर मंजूर कर लिया और हमारे सुहागरात वाले कुछ फूल अपने प्यार की निशानी के तौर पर अपने पास छुपा कर रख लिए.

फिर एक महीना पूरा हुआ तो मेरे अम्मी अब्बू मुझे लेने आये.
उस दिन मानो हजार सालों के बाद मुझे अपनी मुहब्बत जलालुद्दीन की सूरत देखने को मिली.

उनके और मेरे अब्बू के बीच कुछ बातें हुईं, मैंने देखा कि मेरी अम्मी ने जलालुद्दीन के पैर पकड़ लिए और मेरे अब्बू ने उनका हाथ चूम लिया.

मुझे लगा कि जलालुद्दीन आखरी बार अपनी नगमा जान से मिलने आएँगे लेकिन वो तो बहुत बेरुखी से वहीं से वापस लौट गए.

मेरा दिल रोने को हुआ लेकिन अपने अम्मी अब्बू के सामने मैंने खुद को संभाले रखा.

फिर मेरे अम्मी अब्बू मेरे कमरे में आये तो में अपनी अम्मी से लिपट कर रोने लगी.
मेरे वालिद सोच रहे थे कि मैं उनसे इतने दिन बाद मिली हूँ इसलिए रो रही हूँ लेकिन मेरा दिल ही जानता था कि मैं अपने सरताज, अपनी मुहब्बत अपने प्यार जलालुद्दीन के लिए रो रही थी.

यह मेरी जिंदगी का वो एक महीना था जिसने मुझे पूरी तरह से बदल कर रख दिया.

और ये मेरी कहानी नगमा का इलाज का आख़री हिस्सा था जिसमें मेरे नीम्बू बड़े होकर आम हो गए थे, मेरा इलाज पूरा हो गया था और मैं दिल पर पत्थर रख कर अपने महबूब से जुदा हो गई थी.

अपनी अगली कहानी में मैं आपको बताऊंगी कि मेरे आम तरबूज में कैसे बदल गए और मैंने अपनी चुदास की बीमारी का इलाज किन किन तरीकों से जारी रखा.

तब तक के लिए अपनी प्यारी नगमा को इजाजत दीजिये.
आप मुझे बताएं कि आपको मजा आया मेरी हॉट गांड हिंदी सेक्स कहानी पढ़ कर?
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