खेतों में रेश्मा की पहली चुदाई

Kheton Me Reshma Ki Pehli Chudai

समर वैकेशन में गाँव गई शहर की हॉट लड़की रेश्मा और रेनेश की खेतों में भरी हुई कामुक मुलाकात। गोद में उठाना, मालिश का बहाना, फिर बेकाबू होकर पहली चुदाई तक का सफर। पूरी तरह देसी, गरमागरम और मादक हिंदी सेक्स कहानी।

नमस्ते दोस्तों, आप सभी ने मेरी पिछली कहानियों को इतना प्यार दिया, इसके लिए रेनेश ठाकुर दिल से शुक्रगुजार है। बहुत-बहुत थैंक्स तो HSS को भी, जिसने मुझे अपनी फैंटसी लिखने का इतना अच्छा प्लेटफॉर्म दिया।

आज जो कहानी लेकर आया हूँ, वो काफी पुरानी है। उस टाइम मैं B.Com कर रहा था और समर वैकेशन में अपने सबसे प्यारे मामा के गाँव जाता था। मेरे सबसे छोटे मामा मेरे लिए रिश्ते से ज्यादा बेस्ट फ्रेंड जैसे थे। हम दोनों की बॉन्डिंग कमाल की थी – कोई भी राज़ एक-दूसरे से छुपाते नहीं।

इस बार जब मैं मामा के घर पहुँचा तो वो इतने खुश हुए कि उनकी खुशी का ठिकाना ही नहीं था। और मैं तो गाँव में आकर हमेशा राजा बन जाता था। एक दिन सुबह-सुबह मैं और मामा खेतों की तरफ फ्रेश होने जा रहे थे। रास्ते में एक लड़की मिली – नाम था रेश्मा। यार, क्या गज़ब की माल थी वो! गोरी-चिट्टी त्वचा, गोल-मटोल चेहरा, सानिया मिर्ज़ा जैसी नुकीली नाक, कंधों तक कटे हुए घने बाल और ब्रेस्ट… उफ्फ! दो बड़े-बड़े टेनिस बॉल जैसे, जो चलते वक्त उछल-उछल कर बाहर आने को बेकरार रहते। मैं तो उसे देखकर भूखे शेर की तरह ताकने लगा। मुँह से लार टपकने लगी।

हम दोनों एक ही लोटा लेकर जाते थे, मामा लोटा पकड़ते और मैं राजा की तरह चलता। मैंने धीरे से मामा से पूछा, “यार, ये कौन सी अप्सरा है?” मामा हँसे और बोले, “चुप कर रे! ये भी तेरी तरह शहर से आई है, अपने चाचा के घर छुट्टियां मनाने।” मैंने कहा, “वाह, अब तो जोड़ी जमेगी। दोनों शहर वाले!” मामा ने मजाक में कहा, “क्या बोल रहा है यार? मैं तो कई दिनों से लाइन मार रहा हूँ, घास भी नहीं डाली। चल, शर्त लगाते हैं – अगर ये तेरी हो गई तो मैं तुझे टॉकीज में फिल्म दिखाऊँगा।”

मैंने तुरंत कहा, “डन मामू!”

अगले दिन सुबह जल्दी उठा, ट्रैक सूट पहना और अकेला खेतों की तरफ निकल पड़ा। दरअसल, मैंने रेश्मा को उस रास्ते पर जाते देख लिया था। मामा को सोता छोड़कर उसके पीछे-पीछे हो लिया। थोड़ी दूर जाकर सुनसान जगह देखी तो आवाज़ लगाई, “ओये हेलो! तुम्हारा नाम क्या है?”

पहले तो वो चुप रही। जब दोबारा पूछा तो पलटकर बोली, “मैं गाँव के लड़कों से बात नहीं करती।” वाह, उसका पलटना क्या सीन था! चेहरा और भी सुंदर लग रहा था। मैंने मुस्कुराकर कहा, “जी, तब तो आप मुझसे बात कर सकती हैं। मैं भी गाँव का नहीं हूँ, आपके जैसे शहर से छुट्टियाँ मनाने आया हूँ।”

वो हल्का सा मुस्कुराई और बोली, “ओह, मुझे लगा आप भी गाँव के हैं।” मैंने मौका देखकर कहा, “कोई बात नहीं। क्या हम दोस्ती कर सकते हैं?” उसने बिना झिझके हाँ कहा और हाथ आगे बढ़ाया। मैंने हाथ मिलाया – उसकी उँगलियाँ नरम और गर्म थीं। लगा जैसे शर्त की पहली सीढ़ी पार कर ली।

फिर मैंने कहा, “क्या तुम मेरे साथ गाँव घूमना चाहोगी? मैं तुम्हें पूरा गाँव दिखाऊँगा।” वो खुश होकर बोली, “सच में? चलो!” मैंने थोड़ा स्टाइल मारते हुए सिर झुकाकर कहा, “My pleasure…” वो खिलखिलाकर हँस पड़ी। उसकी हँसी इतनी मादक थी कि मन किया वहीं किस कर लूँ। मैंने सोचा – लड़की हँसी तो फँसी!

फिर मैंने कहा, “आज शाम को यहीं मिलना। मैं तुम्हें मामा के खेत दिखाने ले चलूँगा।” उसने सिर हिलाकर हाँ कर दी।

घर लौटकर मैंने मामा को सारी बात बताई। वो हैरान रह गए, “वाह रे! तूने तो पहली बॉल पर सिक्सर मार दिया!” मैंने कहा, “अभी तो सेंचुरी बाकी है मामू, बस देखते जाओ। शाम को खेत पर बने कमरे को थोड़ा साफ कर देना।” मामा हँसकर बोले, “हाँ भांजे श्री, सब इंतज़ाम हो जाएगा।”

दोपहर में हम नहा-धोकर खाना खाए, ताश खेले। जैसे ही चार बजें, मैंने मामा को इशारा किया और हम खेत पर पहुँचे। कमरे को अच्छे से साफ-सुथरा किया, पुराना बिस्तर झाड़ा और वापस आ गए।

शाम पाँच बजे रेश्मा आई। उसने सिंपल सलवार-कमीज़ पहनी थी, लेकिन उसकी कर्व्स इतने परफेक्ट थे कि दिल धड़कने लगा। उसने हाथ मिलाते हुए कहा, “चलें?” मैंने पूछा, “अभी तक नाम नहीं बताया अपना।” वो शरमाकर हँसी, “सॉरी, माय नेम इज़ रेश्मा। एंड यू?” मैंने कहा, “हाय, मैं रेनेश ठाकुर, ग्वालियर से। तुम अच्छी इंग्लिश भी बोलती हो?” वो बोली, “हाँ, शहर की जो ठहरी!”

हम खेतों की तरफ चल पड़े। मैंने उसे पूरे खेत दिखाए – फसलें, कुआँ, हवा का मजा। बातें करते-करते वो खेत की मेड़ पर फिसल गई और पैर में हल्की चोट लग गई। वो दर्द से कराही। मैंने तुरंत हाथ देकर उठाया, लेकिन वो ठीक से चल नहीं पा रही थी। मैंने कहा, “लगता है मोच आ गई। अगर तुम्हें ठीक लगे तो मैं तुम्हें गोद में उठाकर उस कमरे तक ले चलूँ? वहाँ बैठकर पैर दबा दूँगा, आराम मिलेगा।”

वो थोड़ा शरमाई, लेकिन दर्द की वजह से हँसते हुए बोली, “ठीक है… लेकिन जल्दी।”

जब मैंने उसे गोद में उठाया तो उसकी कमर पतली और बॉडी इतनी सॉफ्ट थी कि मेरा लंड तुरंत टाइट हो गया। उसकी चूत की गर्मी मेरे हाथों को महसूस हो रही थी – लगा जैसे उसने पैंटी नहीं पहनी है। कमरे में पहुँचकर मैंने उसे धीरे से ज़मीन पर बिछे बिस्तर पर लिटाया। उसका लोअर थोड़ा ऊपर करके पैर दबाने लगा। मेरे हाथ उसके नरम पैरों पर फिसल रहे थे। वो हल्का सा सिहर उठी और आह भरी।

मैंने हल्के से पूछा, “अगर लोअर थोड़ा नीचे कर दो तो अच्छे से मालिश कर पाऊँगा।” वो पहले तो मना करने लगी, फिर शरमाते हुए बोली, “असल में… मैंने पैंटी नहीं पहनी है।” मैं मुस्कुराया और बोला, “कोई बात नहीं बेबी, मैं आँखें बंद कर लूँगा। वैसे भी अब अंधेरा हो रहा है।”

वो हल्का सा हँसी और बोली, “ठीक है… तुम आँखें बंद करो।” मैंने सिर फेर लिया। उसने लोअर उतार दिया और टी-शर्ट से अपनी गांड छुपाते हुए बोली, “अब करो।” मैंने पलटा तो वो पेट के बल लेटी थी। उसकी गोल-मटोल गांड आधी दिख रही थी – बिल्कुल स्मूथ और गुलाबी।

मैंने धीरे-धीरे उसके पैरों से ऊपर की तरफ हाथ फेरना शुरू किया। मेरी उँगलियाँ उसकी जांघों तक पहुँचीं। अचानक वो पलटी और मुझसे लिपट गई। उसकी साँसें तेज़ थीं। मैंने पूछा, “क्या हुआ?” वो शरमाते हुए बोली, “कुछ नहीं… बस अच्छा लग रहा है।”

मैंने उसे बाहों में भर लिया और उसके गुलाबी होंठों पर अपने होंठ रख दिए। पहले तो वो हल्का सा विरोध किया, लेकिन जल्दी ही वो भी साथ देने लगी। उसकी जीभ मेरी जीभ से खेलने लगी। मेरी एक उंगली उसकी गीली चूत की दरार पर फिसली तो वो सिहर उठी और आह भरी, “रेनेश… क्या कर रहे हो… उफ्फ…”

मैंने उसके कान में फुसफुसाया, “प्यासे को कुएँ तक लाकर पानी नहीं पिलाऊँगा तो पाप लगेगा ना…” और धीरे से उंगली अंदर सरका दी। वो मेरी बाहों में झूल गई। उसकी चूत इतनी टाइट और गीली थी कि मेरे लंड को बेकरारी होने लगी।

अब वो भी गरम हो चुकी थी। उसने मेरी ज़िप खोली और मेरा मोटा लंड बाहर निकालकर सहलाने लगी। उसकी नरम हथेली से मुझे इतना मजा आने लगा कि मैंने उसे बिस्तर पर लिटा दिया और उसके माथे से लेकर पैर के अंगूठे तक किस करता गया। उसकी ब्रेस्ट को मुँह में लेकर चूसा, निप्पल्स को दाँतों से काटा। वो बस आहें भर रही थी – “आह… रेनेश… कितना अच्छा लग रहा है… और करो…”

अब वो खुद बेकरार हो गई। उसने धीरे से कहा, “अब और इंतज़ार मत कराओ… मुझे शांत कर दो…” मैंने अपना लंड उसकी गीली चूत पर रखा और धीरे से अंदर सरकाया। वो इतनी टाइट थी कि पहले हल्का दर्द हुआ, लेकिन वो खुद नीचे से कमर उठाकर साथ देने लगी। मैंने स्पीड बढ़ाई – धीरे-धीरे फिर तेज़-तेज़ धक्के। कमरा उसकी आहों और मेरे धड़कनों से भर गया।

लगभग दस मिनट बाद वो ज़ोर से मेरे गले लग गई और चरम पर पहुँच गई – उसकी चूत ने मेरे लंड को जोर से जकड़ लिया। मैं भी नहीं रुका, और पाँच मिनट बाद मैं भी उसके अंदर झड़ गया। हम दोनों पसीने से तर, एक-दूसरे से लिपटे लेटे रहे।

फिर वो मुस्कुराते हुए उठी, कपड़े ठीक किए और बोली, “ये हमारा सीक्रेट रहेगा।” मैंने उसे गले लगाया और घर तक छोड़ने गया। उसके बाद हमारी कुछ और मुलाकातें हुईं, लेकिन छुट्टियाँ खत्म होते ही मैं वापस शहर लौट आया। बाद में पता चला कि उसकी शादी हो गई।

मामा को सब पता था। वो मुझे अपना गुरु मानते थे, लेकिन मुझे आज भी रेश्मा की वो गरमागरम यादें ताज़ा लगती हैं।

दोस्तों, कैसी लगी मेरी गाँव की शेरनी वाली कहानी? पसंद आए तो मेल जरूर करना, ताकि मैं और गरमागरम कहानियाँ लिख सकूँ।

गाँव की हवा में बसी थी वो मस्त जवानी,
शहर की रेश्मा बनी खेतों की रानी।
गोद में उठी तो लगी आग बदन में,
एक धक्के में खुल गई चूत की कहानी।

थैंक्स ऑल फैंस!